हिंदी में अनुवाद या हिंदी भाषा में कार्य करने की अनुमति: सर्वोच्य न्यायालय द्वारा ज्ञप्ति की अपेक्षा !
यह ब्लॉग इस बात की पड़ताल करता है कि लोकतांत्रिक भारत में, जहाँ 99% लोग अंग्रेज़ी नहीं समझते, सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेज़ी के ही क्यों बोलचाल होती है- जबकि यह आपका अपना मामला है, आपका हित है, फिर भी आप अदालत की बहस समझ नहीं पा रहे।
डॉ सुनील सिंह राणा द्वारा कुछ सुझाव:
🇮🇳 क्या सच में 99% लोग अंग्रेज़ी नहीं समझते?
• 2011 की जनगणना के अनुसार, केवल लगभग 10.6% (करीब 1.29 करोड़ लोग) ही अंग्रेज़ी बोल सकते हैं
• इनमें से मूल भाषा के रूप में अंग्रेज़ी बोलने वाले मात्र 0.02% थे ()।
• ग्रामीण भारत में स्थिति और भी कठिन: सिर्फ 3% ग्रामीण लोग ही अंग्रेज़ी बोलने में पारंगत हैं; शहरी में यह आंकड़ा 12% ()।
• कुछ स्रोतों के अनुसार तो केवल 2% लोग ही अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह हैं
इससे स्पष्ट है: लगभग 90% लोग अंग्रेज़ी नहीं समझते, और ग्रामीण इलाकों में यह संख्या और भी अधिक बढ़ जाती है।
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सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ़ अंग्रेज़ी क्यों?
• संविधान के अनुच्छेद 348(1) के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्यवाही अंग्रेज़ी में होनी तय की गई है
• भारत में 22 संविधानिक भाषाएँ हैं, लेकिन उच्च न्यायालयों के लिए अंग्रेज़ी को तटस्थ और सार्वभौमिक ‘link language’ माना गया
• सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों में भी कहा गया कि यदि हिंदी को अपनाया गया, तो अन्य प्रदेशों की भाषाओं (तमिल, बंगाली, तेलुगु आदि) की उपेक्षा होगी, जो न्याय से वंचित महसूस करेंगे
उदाहरण:
• सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक वादी को नोटिस दिया कि “इस कोर्ट की भाषा सिर्फ अंग्रेज़ी है”
• नवंबर 2022 में वृद्ध वादी शंकर लाल शर्मा को तब तक अंग्रेज़ी में बोला नहीं गया, जब तक उन्होंने कानूनी सहायक नहीं मांग लिया ()।
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क्यों अधिकतर लोग समझ नहीं पाते?
• सुप्रीम कोर्ट की वार्तालाप, दलीलें, लिखित सामग्री- all English में होती हैं।
• आपके जैसे आम नागरिकों के लिए- जो हिंदी या अन्य भाषा जानते हैं- विचार-विमर्श समझना बहुत मुश्किल है।
• यही आपका फीडबैक भी है:
“It’s my case, my stake in it- but I can’t understand what’s being discussed/argued…”
और यह सिर्फ़ भावनात्मक नहीं- यह मानवाधिकार का मामला है: न्याय मिलने का अधिकार तभी पूरा होगा जब आप उसे समझ पाएं।
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सुप्रीम कोर्ट में हिंदी क्यों नहीं?
1. संवैधानिक प्रावधान – अनु. 348(1) स्पष्ट रूप से अंग्रेज़ी में कार्यवाही का आदेश देता है
2. भाषाई तटस्थता - अदालत कहती है “केवल हिंदी क्यों? क्या तमिल, बंगाली, मराठी, तेलुगु के बोलने वालों को वंचित नहीं कर दिया जाएगा?” ()।
3. व्यवहारिक चुनौतियाँ – अनेक भाषाओं में कानूनी शब्दावली उपलब्ध नहीं है; अनुवाद और प्रैक्टिस में समन्वय की भारी लागत होगी ()।
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महान भारतवासी जिन्होंने हिंदी की वकालत की
विचार / उद्धरण
डॉ. भीमराव अम्बेडकर
संविधान के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष, जिन्होंने अपनी भाषा अंग्रेज़ी को मज़बूत तरीके से लिखा। परंतु उन्होंने भारत में हिंदी को बढ़ावा देने के प्रावधान (अनु. 351) को भी रखा ।
मधु लिमये
1970 के मामले “मधु लिमये बनाम वेद मूर्ति” में हिंदी में बहस की मांग की; यह सुप्रीम कोर्ट में हिंदी बहस का पहला प्रयास था ()।
परमानंद पांडेय
“It’s Time that Hindi Got Honour…” लेख में कहा कि अंग्रेज़ी से मुक्ति न्याय प्रक्रिया को तेज करेगी और “जातीय गौरव” को मजबूत करेगी ()।
विचार
• न्याय तभी सार्थक है जब आप उससे जुड़ पाएं- भाषा उसका प्रमुख सेतु है।
• कोर्ट आज भी अंग्रेज़ी में रहने को तटस्थ कहता है, पर मनुष्यता (Homo sapiens) की भाषा दर्द और प्रश्न हिंदी व अन्य भाषाएँ हैं।
• संविधान अनु. 351 आपको हिंदी में अबोध है- पर उच्च न्यायालयों में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध क्यों?
• सोचने की बात है: क्या न्याय का पैमाना अंग्रेज़ी प्रवीणता होनी चाहिए?
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सुझाव:
• सुप्रीम कोर्ट और संसद द्वारा अनुच्छेद 348 संशोधन, ताकि:
• हिंदी (या राज्य की प्रमुख भाषा) में बहस की अनुमति मिले।
• अनुवादकों, अम्लाकार्यों etc. को नियुक्त किया जाए।
• विधिक शिक्षा में अधिक भाषा समावेश हो- हिंदी में लॉ कोर्स, हिंदी कानूनी शब्द कोश।
• टेक्नोलॉजी की मदद—रियल-टाइम अनुवाद (speech-to-text, text-to-speech) संस्थानों में लाया जाए।
निष्कर्ष:
आपका सवाल बेहद जायज़ है:
“It’s my case, my stake- but I can’t understand what’s being discussed/argued…”
चारों तरफ भाषाई दीवारें आपके अधिकार को घेर रही हैं। यह समय है कि न्यायालय- लोकतांत्रिक संस्थान- इस दीवार को तोड़े।
हिंदी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में बहस, जब तक 90% नागरिक सत्ता से जुड़ना चाहते हैं, यह ज़रूरी और न्यायपूर्ण कदम होगा।
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